प्रबन्ध के सिद्धांत एक आधारभूत सत्य है और यह सामान्यतः कारण एवं परिणाम में संबंध प्रकट करता है। प्रबन्ध के सिद्धांत के आधार पर प्रबंधक अपने संस्थान के भविष्य की कल्पना कर सकते हैं तथा इन सिंद्धान्तों को ध्यान में रखकर वे इन छोटी-मोटी गलतियों से भी बच सकते हैं।
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सहकारिता क्या है ?
सहकारिता एक स्वैच्छिक प्रकृति की होती है। यह लोगों के एक साथ काम करने की इच्छा से उत्पन्न होती है। यह अनौपचारिक संबंधों से उत्पन्न होती है। किसी भी सामूहिक क्रियाकलाप में बगैर समन्वय के सहकारिता व्यर्थ होती है।
यह समान उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए समूह द्वारा ऐच्छिक रूप में किए गए सामूहिक प्रयासों को व्यक्त करती है।प्रबंध के कार्य क्या है ?
प्रबन्ध के निम्नलिखित कार्य है :-
- नियोजन (Planning) :- प्रबंध भविष्य की आवश्यकताओं का पूर्वानुमान लगाता है ताकि निर्धारित लक्ष्यों की दृष्टि से किए जाने वाले वर्तमान प्रयासों को उनके अनुरूप बनाया जा सके।नियोजन का मतलब होता है कि क्या करना है, क्यों करना है, कहाँ करना है, कब करना है, कैसे करना है तथा किस व्यक्ति द्वारा करना है, इन सभी बातों पर ध्यान देना। इसके साथ ही नियोजन के अंतगर्त विपरीत परिस्थितियों का सामना करने के तरीकों पर भी विचार किया जाता है।
- संगठन (Organisation) :- नियोजन द्वारा उद्देश्य एवं लक्ष्य निर्धारित कर लेने के पश्चात उन्हें कार्यन्वित करने की समस्या आती है जिसे प्रबंध संगठन के माध्यम से करता है। संगठन निर्धारित लक्ष्यों की पूर्ति करने वाले तंत्र है। उपक्रम की योजनाएं चाहे कितनी भी अच्छी एवं आकर्षक क्यों न हो यदि अच्छे संगठन का आभाव है तो सफलता की कामना करना निष्फल होगा। इस तरह कुशल एवं प्रभावी संगठन का निर्माण करना बहुत जरूरी रहता है।
- नियुक्तियाँ (Staffing) :- प्रबंध का प्राथमिक कार्य है कर्मचारियों की नियुक्तियाँ करना है जिसका अर्थ है - संगठन की योजना के अनुसार आवश्यक पदाधिकारियों एवं कर्मचारियों की नियुक्ति करना उनको आवश्यक प्रशिक्षण प्रदान करना।
- निर्देशन (Directing) :- प्रबंध मूलतः व्यक्तियों से कार्य कराने व करने की कला है। प्रबंध का चौथा महत्वपूर्ण कार्य है उपक्रम को निर्देशन अथवा संचालन प्रदान करना। निर्देशन का अर्थ है - संस्था में विभिन्न नियुक्त व्यक्तियों को यह बताना कि उन्हें क्या करना है, कैसे करना है, कब करना है तथा यह देखता है कि वे व्यक्ति अपना कार्य उसी भांति कर रहे हैं या नहीं। निर्देशन प्रबंध का वह महत्वपूर्ण कार्य है जो संगठित प्रयत्नों को प्रारम्भ करता है।निर्देशन के अंतर्गत निम्न चार क्रियाओं को सम्मिलित किया जाता है :
- पर्यवेक्षण (Supervision)
- सम्प्रेषण (Communication)
- नेतृत्व (Leadership)
- अभिप्रेरणा (Motivation)
- नियंत्रण (Controlling) :- नियन्त्रण से आशय केवल किए गए कार्य की जाँच करना मात्र ही नहीं है बल्कि ऐसे उपाय करना जिससे उपक्रम के कारोबार को निर्धारित लक्ष्यों की पूर्ति हेतु निश्चित योजनाओं के अनुसार चलाया जा सके और यदि उसमें कहीं कोई अंतर आ जाए तो सुधारात्मक कदम उठाया जा सके। नियंत्रण प्रबंध का एक भाग है।
समन्वय (Co-ordination) क्या है ?
समन्वय (Co-ordination) प्रबंध का सार है जो उपक्रम की विभिन्न क्रियाओं में तालमेल बनाये रखता है। यह निर्धारित लक्ष्य पूर्ति हेतु की जाने वाली विभिन्न क्रियाओं में एकता अथवा तालमेल बनाये रखता है। समन्वय से लोग एक टीम के रूप में कार्य करते हैं, जिससे पारस्परिक सहयोग की वृद्धि होती है तथा संबंधित व्यावसायिक उपक्रम का सफल संचालन सम्भव होता है।
समन्वय के लक्षण अथवा विशेषताएँ :-
- समन्वय एक सतत प्रक्रिया है।
- यह प्रबंध का सार है।
- यह समूह प्रयासों के अनावश्यक अपवव्य को रोकता है।
- समन्वय स्थापित करने का प्राथमिक कार्य प्रबन्धकों का है।
- यह क्रियाओं में एकरूपता लता है।
समन्वय वहां जरूरी होता है जहाँ लोगों का एक समूह समान उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए एक साथ काम करता है।
मुख्य कार्यकारी अधिकारी (Chief Executive Officer)किसे कहते हैं ?
मुख्य कार्यकारी अधिकारी (Chief Executive Officer)प्रबंध दल के नेता होता है। इस पद को विभिन्न नामों जैसे - जनरल मैनेजर, महाप्रबन्धक, अध्यक्ष आदि के नामों से जाना जाता है। यह संचालक मंडल के पर्यवेक्षण एवं नियंत्रण में कार्य करता है।
संचालन मंडल के मुख्य कार्य निम्नलिखित है :-
- संचालक मंडल एवं समग्र संगठन के मध्य सम्पर्क एवं समन्वय बनाये रखना।
- संचालन मंडल द्वारा निर्धारित नीतियों को प्रभावपूर्ण ढंग से लागू करना।
- इस तथ्य की जानकारी करना कि अधीनस्थ कर्मचारी नीतियों के प्रभावों से अवगत हैं।
- यह जानने का प्रयास करना कि सभी स्तर के अधीनस्थ अधिकारीयों द्वारा मितव्ययिता एवं कार्य-कुशलता के उच्च स्तर को बनाये रखने के लिए ध्यान दिया गया है नहीं।
- प्रभावशाली समन्वय की स्थापना करना।
- अधीनस्थ अधिकारीयों में स्वतंत्रतापूर्वक या स्वैच्छिक आधार पर कार्य करने की भावना को बनाये रखना।
निम्नस्तरीय प्रबंध के कार्य क्या है ?
निम्नस्तरीय प्रबंध के प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं :
- उच्च प्रबंध द्वारा निर्धारित लक्ष्यों के अनुरूप दैनिक योजनाओं का निर्माण करना।
- कर्मचारियों को कार्य सौंपना, उन्हें प्रशिक्षित करने की व्यवस्था करना एवं उनका विकास करना।
- श्रमिकों को सलाह देना व उनकी सहायता करना।
- कर्मचारियों के कार्य एवं उत्तरदायित्व को निर्धारित करना एवं उन्हें कार्य सौंपना।
- उत्पादन कार्यों में लीन कर्मचारियों से प्रत्यक्ष सम्पर्क स्थापित रखना।
- कार्य की दशाओं में सुधार हेतु उच्च प्रबंध को आवश्यक सुझाव देना।
- सामग्री, औजारों व मशीनों की व्यवस्था करना।
संचालन मंडल (Board Of Directors)किसे कहते है ?
संचालन मंडल (Board Of Directors) उच्च प्रबंध का एक महत्पूर्ण अंग है। इसी के द्वारा कम्पनी के उद्देश्यों एवं दीर्घकालीन नीतियों का निर्धारण किया जाता है साथ ही संगठन पर नियंत्रण भी रखा जाता है।
यह वास्तव में एक नीति निर्धारक एवं नियंत्रक सत्ता है। संचालक मण्डल में कुछ विशिष्ट योग्यताएँ होना आवश्यक है ताकि संस्था का सफलतापूर्वक संचालन व विकास हो सके।
संचालन मंडल के मुख्य कार्य निम्नलिखित है :-
- निक्षेपी का कार्य (Trusteeship)
- उपक्रम के उद्देश्यों का निर्धारण करना (Determination Of Enterprise Objectives)
- मुख्य अधिशासी का चयन करना (Selection Of Key Executives)
- योजनाओं एवं परिणामों की जाँच करना (Checking Of Plans And Results)
- बजटों का अनुमोदन करना (Approval Of Budgets)
- व्यवसाय में दीर्घकालीन स्थायित्व प्राप्त करना
- आय का वितरण करना (Distribution Of Corporate Earning)
- महत्वपूर्ण मामलों पर विचार-विमर्श करना (Asking Discerning Questions)
मध्यस्तरीय प्रबंध के कार्य क्या है ?
मध्यस्तरीय प्रबंध के निम्नलिखित मुख्य कार्य हैं :-
- उच्चस्तरीय तथा निम्नस्तरीय प्रबंध के मध्य कड़ी का काम करना एवं प्रभावी समन्वय स्थापित करना।
- संगठन के विभिन्न अंगों में प्रभावी संतुलन बनाये रखना।
- वास्तविक परिणामों पर नजर रखना एवं उनकी तुलना निर्धारित लक्ष्यों से करना।
- उच्चस्तरीय प्रबंध द्वारा निर्धारित उद्देश्य, लक्ष्यों एवं नीतियों की व्याख्या करना।
- पर्यवेक्षकों को प्रशिक्षण प्रदान करना तथा उनको अभिप्रेरित करना।
- उपयुक्त विभागों की स्थापना करना।
उच्चस्तरीय प्रबंध के कार्य क्या है ?
उच्च स्तरीय प्रबंध में मुख्य रूप से संचालक मंडल तथा मुख्य कार्यकारी अधिकारी को सम्मिलित किया जाता है। इनके मुख्य कार्य निम्नलिखित है :-
- महत्वपूर्ण मामलों पर विचार-विर्मश करना ।
- उपक्रम के उद्देश्यों का निर्धारण करना ।
- योजनाओं एवं परिणामों की जाँच करना ।
- आय का वितरण करना ।
- प्रभावशाली समन्वय की स्थापना ।
- अधीनस्थ अधिकारीयों में स्वतंत्रापूर्वक या स्वैच्छिक आधार पर कार्य करने की भावना को बनाये रखना।
- यह जाने का प्रयास करना कि सभी स्तर के अधीनस्थ अधिकारीयों द्वारा मितव्ययिता एवं कार्य-कुशलता के उच्च स्तर को बनाये रखने के लिए ध्यान दिया गया है या नहीं ।
- बजटों का अनुमोदन करना ।
प्रबंध के स्तर क्या है ?
प्रबंध के स्तर (Level Of Management) से तातपर्य किसी संस्था के प्रबंध पदों में आदेश-निर्देश की व्यवस्था है। प्रबंध के स्तर यह स्पष्ट करता है कि किसी अधिकारी की क्या स्थिति है, कौन किसको आदेश देगा तथा कौन किससे आदेश प्राप्त करेगा।
मूल रूप से प्रबंध के निम्नलिखित तीन स्तर हैं :-
- उच्चस्तरीय प्रबंध (Top Level Management) :-उच्चस्तरीय प्रबंध किसी भी संस्था का सर्वोच्च प्रबंध होता है। संस्था का सम्पूर्ण दायित्व उच्चस्तरीय प्रबंध के कंधों पर होता है। इनका मुख्य कार्य नीतियों उद्देश्यों एवं लक्ष्यों का निर्धारण करना है। प्रबंध के इस स्तर में मुख्य रूप सेसंचालन मण्डल तथा मुख्य कार्यकारी अधिकारी को सम्मिलित किया जाता है।
- मध्यस्तरीय प्रबंध (Middle Level Management) :- मध्य स्तरीय प्रबंध, उच्च स्तरीय तथा निम्नस्तरीय प्रबंध के मध्य स्थित होता है। मध्य स्तरीय प्रबंध का कार्य सबसे कठिन होता है क्योंकि इन पर तीन ओर से दबाव रहता है। पहला दबाव उच्चस्तरीय प्रबंधक की ओर से होता है, दूसरा दबाव निम्नस्तरीय प्रबंधक की ओर से होता है तथा तीसरा दबाव मध्यस्तरीय प्रबंधकों का स्वयं का होता है।
- पर्यवेक्षकीय प्रबंध (Supervisory Management) :- यह प्रबंध के स्तरों के क्रम में सबसे नीचे वाला स्तर है। यह प्रबंध का वह स्तर होता है जो उच्च प्रबंध द्वारा निर्धारित उद्देश्यों एवं नीतियों को अंतिम रूप से कर्मचारियों द्वारा क्रियान्वित करवाते है। इस स्तर के अधिकारियों का प्रत्यक्ष संबंध उन कर्मचारियों से होता है जो कार्यों को सम्पन्न करते हैं। इन्हें अलग-अलग नामों से पुकारा जाता है - जैसे पर्यवेक्षकीय या प्राचालन या अंतिम पंक्ति या निम्नस्तरीय प्रबंध।
प्रबंध का महत्व क्या है ?
सभी तरह के संस्था में चाहे वो छोटी या बड़ी, व्यावसायिक हो अथवा गैर व्यावसायिक उसके अंतगर्त सामूहिक प्रयत्नों के द्वारा सामान्य उद्देश्य की पूर्ति की जाती है और इन प्रयत्नों में प्रबंध का काफी महत्व रहता है। प्रबंध के बिना उत्पादन के साधन केवल साधन ही रह जाते है।
सामान्यतः प्रबंध के निम्नलिखित महत्व है :
- प्रबंध निर्धारित लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु उत्पादन के विभिन्न साधनों में प्रभावपूर्ण समन्वय स्थापित कर न्यूनतम प्रयासों से अधिकतम परिणामों की प्राप्ति सम्भव बनाता है। प्रबंध संस्था के उपलब्ध साधनों में उपयुक्त समन्वय स्थापित कर मनुष्यों का विकास करता है।
- अच्छे एवं कुशल प्रबंधन में दूरदर्शिता, योजनाओं के निर्माण की क्षमता, क्रियाओं के निर्धारण की क्षमता, देश की आर्थिक स्थिति का सही मूल्यांकन करने की क्षमता, ग्राहकों की रूचि का अध्ययन करने की क्षमता आदि होती है जो कटु प्रतिस्पर्धा का सामना करने के लिए महत्वपूर्ण है।
- प्रबंध द्वारा प्रारम्भ में आधारभूत नीतियों का निर्माण किया जाता है और बाद में जरूरत के अनुसार विभिन्न नीतियों का निर्धारण किया जाता है।
- प्रबन्धक समाज को स्थिरता प्रदान करने वाला तथा परम्पराओं का संरक्षक है।
- व्यक्तियों के विकास में प्रबंध का अत्यंत महत्व है। प्रबंध की समस्त क्रियाएँ मानवीय विकास से संबंधित होती है। यह व्यक्तियों की कार्यकुशलता में वृद्धि करता है और उनका सर्वांगीण विकास करता है।
- प्रबंधक प्रत्येक व्यवसाय का गतिशील एवं जीवनदायक तत्व होता है उसके नेतृत्व के आभाव में उत्पादन के साधन केवल साधन-मात्र ही रह जाते हैं, कभी उत्पाद नहीं बन पाते हैं।
- प्रबंध की आवश्यकता केवल व्यावसायिक क्षेत्रों में ही नहीं अपितु गैर-व्यावसायिक क्षेत्र जैसे- स्कूल, कॉलेज, धार्मिक एवं राजनैतिक संस्थाओं, सामाजिक कार्यों, यहाँ तक कि जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में जैसे घर,खेल का मैदान आदि में भी रहती है।
- देश की समृद्धि में भी प्रबंध का काफी महत्व रहता है। कुशल प्रबंधक जब न्यूनतम लागत पर अधिकतम उत्पादन सम्भव बनाते हैं। श्रम समस्याओं को सुलझाते हैं। समाज के विभिन्न अंगों के प्रति अपने उत्तरदायित्व को भली-भांति निभाते हैं जिससे राष्ट्र समृद्धि की और बढ़ता है।
प्रबंध की विशेषताएँ क्या है ?
प्रबंध की निम्नलिखित कुछ विशेषताएं है :
- प्रबंध की क्रिया निरंतर चलती रहती है। व्यवसाय में निरंतर समस्याओं के सुधार की आवश्यकता रहती है। इसी कारण प्रबंध को एक सतत् प्रक्रिया कहा जाता है।
- प्रबंध एक सामूहिक क्रिया है, इसका कार्य अन्य व्यक्तियों के सहयोग से कार्य को सम्पादित कराना है।
- प्रबंध कला भी है और विज्ञान भी क्योंकि इसके वैज्ञानिक एवं कलात्मक रूपों को अलग नहीं किया जा सकता है।
- वास्तव में प्रबंध एक सामाजिक क्रिया है क्योंकि मुख्य रूप से इसका संबंध व्यवसाय के मानवीय तत्व से है।
संस्था के सभी कर्मचारी समाज के ही अंग होते हैं। - प्रबंध के सिद्धांत विश्वव्यापी हैं। किसी भी उपक्रम में जहाँ मनुष्यों के समन्वित प्रयास होते हैं प्रबन्ध के सिद्धांत लागू किए जा सकते हैं।
प्रबंध की क्या प्रकृति है ?
प्रबंध की प्रकृति को निम्नलिखित रूपों में समझा जा सकता है -
- प्रबंध विज्ञानं एवं कला दोनों है (Management is Both Science And Art) : - प्रबंध कला और विज्ञानं दोनों है। कला का अर्थ किसी कार्य को करने अथवा किसी उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए ज्ञान एवं कुशलता का उपयोग करना है वास्तव में कला सिद्धांत को व्यावहारिक रूप प्रदान करने की विधि है। प्रबंध में व्यवसाय के उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए ज्ञान व कुशलता का उपयोग निहित होता है। इस प्रकार प्रबंध कला है। जो किन्ही सिद्धांतों पर आधारित हो विज्ञान कहलाता है। व्यावसायिक प्रबंध भी निश्चित सिद्धांतों पर आधारित सुव्यवस्थित ज्ञान का भण्डार है। इस तरह से प्रबंध विज्ञान की कोटि में रखने के लिए पर्याप्त है। इस तरह से प्रबंध विज्ञान और कला दोनों है।
- प्रबंध एक सार्वभौमिक क्रिया है (Management is a Universal Process) :- प्रबंध का उद्देश्य सामूहिक प्रयत्नों को इस प्रकार नियोजित व नियंत्रित करना है कि कम से कम लागत पर अधिकतम सीमा तक लक्ष्यों की पूर्ति की जा सके। प्रबंध का महत्त्व सर्वव्यापी है। इसका सिद्धांत धार्मिक, राजनैतिक तथा अन्य सभी क्षेत्रों में लागू होते हैं। इस तरह से प्रबंध एक सार्वभौमिक क्रिया है।
- प्रबंध एक समाजिक उत्तरदायित्व है (Management is a Social Responsibility):- आज व्यवसाय को मनुष्य की ख़ुशी एवं समाज और राष्ट्र की प्रगति के लक्ष्य प्राप्त करने का साधन मन जाता है। यह उत्तरदायित्व पेशेवर प्रबंधकों पर डाला गया है। यही कारण है कि प्रबंध केवल एक आर्थिक संसाधन ही नहीं अपितु एक सामाजिक उत्तरदायित्व है।
- प्रबंध एक जन्मजात प्रतिभा है (Management is an Inborn Quality):- कुछ व्यक्ति जन्म से ही इतने अधिक योग्य, कुशल, अनुभवी एवं दूरदर्शी होते हैं कि वे दूसरों पर कुशलतापूर्वक नेतृत्व एवं संगठन करने की क्षमता रखते हैं। ये गन इसमें जन्मजात होते हैं इसलिए प्रबंध एक जन्मजात प्रतिभा भी है। लेकिन आज के युग में प्रबंध प्रबन्धकीय शिक्षा प्राप्त व्यक्ति कर रहे हैं। अतः प्रबंध एक जन्मजात प्रतिभा के साथ-साथ अर्जित प्रतिभा भी है।
- प्रबंध एक सामूहिक क्रिया है (Management is a Group Activity):- प्रबंध एक सामूहिक क्रिया इसलिए कहा जाता है क्योंकि संस्था के लक्ष्यों एवं उद्देश्यों की प्राप्ति एक व्यक्ति की तुलना में अनेक व्यक्तियों अथवा समूह के प्रयासों द्वारा होना अधिक सरल है।
- प्रबंध एक अदृश्य शक्ति है (Management is An Invisible Force):- प्रबंध एक अदृश्य शक्ति होती है जो साधनों के सर्वोत्तम उपयोग में सहयोग करती है।
प्रबंध के उद्देश्य क्या है ?
प्रबंध एक प्रक्रिया है। अतः इनके भी कुछ उद्देश्य हैं। यू तो प्रबंध के बहुत सारे उद्देश्य होता है कुछ प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं :
- प्रबंध का पहला उद्देश्य यह है कि लम्बे समय तक इस प्रतियोगी बाजार में कैसे टिका रहा जाए।
- समाज के लिए रोजगार का सृजन करना भी प्रबंध का उद्देश्य है।
- पर्यावरण पर्दूषण को रोकना भी प्रवन्ध का मुख्य उद्देश्य रहता है।
- कर्मचारियों को उचित पारिश्रमिक देना भी प्रबंध का मुख्य उद्देश्य रहता है क्यूंकि उनके लग्न और मेहनत par ही संगठन का विकास सम्भव है।
- मिलावट को रोकना भी प्रवन्ध का एक उद्देश्य है।
- विकास के अवसर प्रदान करते रहना भी इसका एक उद्देश्य है।
प्रबन्ध (Management) क्या है ?
प्रबंधन एक व्यक्ति या व्यक्तियों का एक समूह है जो संगठन चलाने के लिए जिम्मेदारियों को स्वीकार करता है ।
वे संगठन की सभी आवश्यक गतिविधियों को नियंत्रण करते हैं। प्रबंधन एक निरंतर और कभी खत्म नहीं होने वाली प्रक्रिया है।
प्रबंधन स्वयं काम नहीं करता है। वे संगठन के उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए सभी कार्यकर्ता को काम करने और समन्वय (यानी एक साथ लाने) के लिए प्रेरित करते हैं।
प्रबंध मानवीय प्रयासों के नियोजन, संगठन, समन्वय, निर्देशन एवं नियंत्रण द्वारा उपलब्ध संसाधनों का सर्वोत्तम उपयोग करता है ताकि निर्धारित लक्ष्यों की प्राप्ति की जा सके।
तो इस तरह हम कह सकते हैं कि किसी भी संगठन के निर्धारित उद्देश्यों की पूर्ति हेतु उपलब्ध मानवीय एवं भौतिक साधनों का सर्वोत्तम उपयोग ही प्रबंध है।
कुछ प्रमुख विद्वानों ने प्रबन्ध को इस प्रकार परिभाषित किया है :-
- सी डब्ल्यू विल्सन के अनुसार : इनके अनुसार निश्चित उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु मानवीय शक्ति का प्रयोग एवं निर्देशित करने की विधि प्रबंध कहलाती है।
- लारेंस ए. एप्पले के अनुसार : इनके अनुसार प्रबंध व्यक्तियों के विकास से संबंधित है न कि वस्तुओं के निर्देशन से।
- हेरोल्ड कुन्टज के अनुसार : प्रबंध औपचारिक रूप से समूहों में संगठित मनुष्यों से तथा उनके मिल-जुलकर काम करने तथा कराने की कला है।
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